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क़िस्सा लॉकडाउन का

"आयिए कौशिक भाई साहेब !!! क्या चाहिए?” किराने की दुकान वाले ने प्यार से पूछा । कुछ ख़ास नहीं भैया, बस कुछ राशन का सामान चाहिए। ये लीजिए सामान की लिस्ट है।
सुंदर!! ये कौशिक साहेब का सामान निकाल दो बेटा !!! सुंदर जो किराने की दुकान पर काम करता था झट से सामान की लिस्ट कौशिक के हाथों से ले लीया। और सरसरी निगाहों से लिस्ट को पढ़ता गया।
भैया आप अपना झोला तो लाए होंगे ना ? आज कल ये प्लास्टिक का बैग बंद हो गया है !!! नया नियम आया है कि अपने झोले में ही सामान ले जाएँ। और अब कोरोना बीमारी भी तो धीरे धीरे फैल रही है!!! कौशिक मन ही मन हंसते हुए बोला "हाँ भई लाया हूँ झोला, लो इसमें सामान निकाल दो”।
फिर सुंदर सामान निकाल कर झोले में रखता गया ।
दुकान मालिक ने कौशिक से ऐसे ही मन हल्का करने के लिए बोले "ये क़ोरोना वाइरस तो अब फैलता ही जा रहा है कौशिक भाई साहेब । सबको बाहर निकलने पर मास्क पहनें रहना चाहिए और एक दूसरे से दूरी बना के रखना चाहिए। बहुत देशों में तो कर्फ्यू लग गया है, अब अपने देश में देखिए क्या होता है ।"
हाँ ये तो है भाई साहेब! "कौशिक भी उनके हाँ में हाँ मिला दिया ”
अचानक मोबाइल की घंटी बज़ी । उधर से श्रीमती जी का फ़ोन था । जल्दी से हड़बड़ा के फ़ोन उठाया लेकिन आवाज़ साफ़ नहीं आ रही थी । हैलो हैलो हल्लोव!!!! बोल रहा हूँ !! बोलो क्या हुआ ? उधर से आवाज़ आयी लेकिन कुछ साफ़ सुनायी नहीं दे रहा था, कुछ कर्फ्यू शब्द सुनायी दे रहा था । शायद दुकान के अंदर नेट्वर्क नहीं मिल रहा था । दुकान से बाहर आया तो आवाज़ साफ़ आने लगी ।
"अरे सुनो!!! आज रात से ३ हफ़्ते के लिए कर्फ्यू लग रहा है । क़ोरोना वाइरस की वजह से । तो अब तुम जीतना सामान हो सके अधिक ही लाना! और मेरा फ़ेस वाश ज़रूर लेते आना ” अरे कैसे? अचानक ? “हाँ अभी समाचार में आ रहा था”। अभी कौशिक फ़ोन पे बात कर ही रहा था तबतक पीछे देखा सैकड़ों लोगों की भीड़ दुकान में घुस रही थी !!! ना कोई मास्क लगाया था ना कोई एक दूसरे से दूरी । सब लोग एक दूसरे को धक्का मुक्की करके घुसे जा रहे थे ।अच्छा ठीक है तुम फ़ोन रखो , यहाँ तो बहुत भीड़ लग गयी अचानक! देखता हूँ अंदर सुंदर ने सामान निकाला है कि नहीं ।
कौशिक जैसे ही दुकान के पास गया तबतक वहाँ लोगों की भीड़ ने दुकान को भर दिया था । अब इस भीड़ में कहाँ सुंदर और कहाँ दुकान के मालिक, कोई भी नज़र नहीं आ रहा था!!! जो कुछ देर पहले क़ोरोना पे इतना सुंदर ज्ञान दे रहे थे।
दुकान के अंदर जाने की बिलकुल भी जगह नहीं थी । एक बार दम लगा के अंदर जाने की कोशिश की लेकिन तब तक एक मज़बूत हाथों ने कौशिक के गर्दन को पकड़ के फिर से पीछे कर दिया और खुद अंदर घुस गया ।
एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह भीड़ से पीछे आ के खड़ा हो गया और दुकान के अंदर जाने की जुगाड़ सोंचने लगा ।अब बिना समान लिए घर क्या मुँह ले के जाऊँ ।
फिर कौशिक के आँखों ने रास्ता धुँध लिया ।भीड़ के पास गया और नीचे ज़मीन पर झुक गया और किसी के दो पैरों के बीचों बीच घुस गया और ज़ोर से अंदर के तरफ़ घुसता गया । जब दुकान के अंदर पहुँचा तो सुंदर कौशिक के झोले को जिसमें आधा अधूरा ही सामान भरा था लिए कोने में खड़ा था । सुंदर भी कौशिक को देखते ही झोला कौशिक को पकड़ा दिया और बोलता गया की भाईया इतना ही सामान हो पाया है और बाक़ी का सामान तो मुश्किल है अब मिलना । इतनी भिड़ अचानक आ गई !
कौशिक भी बोला की ठीक है जो मिल पाए वही काफ़ी है । ठीक है ये पैसे लो अंकल जी को दे देना और जो ऊपर नीचे हो खाते में लिख देंगे ।
फिर कौशिक जैसे दुकान के अंदर गया था वैसे ही बाहर भी आ गया !!!
बाहर निकलते ही सोचनें लगा ये कर्फ्यू तो दूरी बनाने के लिए किया गया था लेकिन क्या हमने ये भीड़ बना के उसका पालन किया ? मन ही ने उत्तर दे दिया नहीं!
अब घर पहुँचते ही श्रीमती जी का दिमाग़ अलग से भरा पड़ा था कि जो सामान पहले लिखा था वह भी नहीं लाए ।
अब मैं क्या बताता कि बाहर क्या हाल है ? और इतना सामान भी कैसे ले के आ पाया ।
- अरुण सिंह

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