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पुराना चश्मा

ऑफिस का काम समाप्त करके जल्दी से बस स्टैंड पर आया ताकि कोई बस मिल जाए और समय से घर पहुँच जाऊं।
रात के 9 बज चुके थे। अंधेरी रात होने की वजह से कुछ साफ दिखाई नही दे रहा था। और बारिश भी ऐसी हो रही थी मानो कभी रुकेगी ही नहीं। बस का इंतजार करते करते आधा घंटा हो गया होगा। मन मे यही सोंच रहा था कि इंडिया मे कब वह दिन आएगा जब पब्लिक ट्रांसपोर्ट सही हो जाएँगे? यह ख्याल इसलिए आया कि ऑफिस के काम की वजह से पिछले साल जापान गया था । वहाँ पब्लिक ट्रांसपोर्ट मुस्किल में कभी एक सेकंड की भी देरी से आती हो।
अभी यही सब सोंच ही रहा था कि सामने अचानक एक बूढ़े दम्पति एक लकड़ी के छड़ी को पकड़े, एक दूसरे का हाथ पकड़े चले आ रहे थे। उनकी उम्र यही कोई 80 साल के आस पास की होगी। अंधेरे और बारिश की वजह से उन्हे कुछ साफ दिखाई नही दे रहा था। बहुत मुस्किल से छड़ी के सहारे रास्ते पर गड्ढे ढूढ़ते चल रहे थे। बस स्टैंड के पास आते ही गड्ढे नापने मे कुछ ग़लती हुई और दोनो बूढ़े दम्पति सीधे आ के मेरे उपर गिर गये।
उन्हे सम्भालते हुए अनायास ही पूछ बैठा "अंकल जी, कहाँ जाना है।" लड़खड़ाती हुई आवाज़ मे बोले "बेटा, यही पास मे ही हमारा घर है।" मैं उनसे बिना पूछे ही उन दोनो को सहारा देते उनके साथ चल दिया।
कुछ दूर चलने के बाद उन्होने बोला "बस बेटा, हमारा घर आ गया।" फिर मैने कहा "ठीक है, अंकल जी, अब आप लोग घर मे जाइए मैं भी अब वापस बस स्टॅंड जाता हूँ कहीं मेरी बस निकल ना गयी हो! "
उन दोनो ने कस के मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले "नही बेटा, अब चाय पी कर जाना बहुत ठंड है।" फिर मैं मना नहीँ कर सका और उनके साथ घर के अंदर चला गया। आंटी किचन मे चली गयी और अंकल मेरे साथ सोफे पर बैठ गये। फिर मेरे बिना पूछे ही बताने लगे की "बेटा हम लोग हमारे पोते के जन्मदिन के पार्टी मे अपने बेटे के घर गये थे। हमारा बेटा यहीं पास मे रहता है। बेटा जब बड़ा हो गया तो अलग घर ले लिया और बहू के साथ रहने लगा। उसको हमारे साथ असहज महसूस होता था। उसके ऑफीस के दोस्त और मित्रों के आने पर उसको हमारे साथ रहने मे अच्छा महसूस नही होता था। लेकिन फिर भी हमारे बारे मे कितना सोचता था की पास मे ही घर ले लिया। अब पोते की वजह से हम लोगों को रहा नही जाता और मिलने चले जाते हैं। आज भी मेरे पोते ने ही फोन कर के हमको बुलाया था कि दादा दादी अगर आप लोग नही आओगे तो मैं केक नही कातूंगा। फिर पार्टी से आते वक्त बेटे ने बोला भी तो था की पापा अगर आपको कोई दिक्कत ना हो तो मैं अपने कार से आपको घर छोड़ देता हूँ! लेकिन हमने ही माना कर दिया कि बेटा यहीं तो घर है और बारिश भी थोड़ी थोड़ी ही हो रही है हम चले जाएँगे । तब जा के माना और हम पैदल चले आए।"
इतनी ही देर मे आंटी जी चाय बना के काँपते हुए हाथों से 2 कप ला के टेबल पर रख दी। बड़े प्यार से बोला "लो, बेटा चाय पी लो।" अभी चाय का एक ही शिप पिया होगा तो याद आया सुबह पापा ने अपना चश्मा दिया था उसका फ्रेम ठीक कराने के लिए। अपने बैग मे हाथ डाला और चस्मा निकाला फिर दीवार पे लगी घड़ी मे समय देखा रात के 10:45 हो गये थे।
फिर क्या था, जल्दी से उन दोनों से विदा ली और सड़्क पे भागने लगा कि कोई ऑप्टिकल शॉप दिख जाए और पापा का चस्मा ठीक करा लूँ। फिर बड़ी मुस्किल से एक शॉप मिली जो बिल्कुल बंद हो रही थी , मेरे बहुत आग्रह करने पर उसने चश्मा सही किया। अब जल्दी से बस स्टैंड गया और बस से घर पहुँचा। करीब रात के 12:30 बज गये होंगे। घर पहुँच के घर की घंटी बजाई तो दरवाजे पे पापा खड़े थे, वो मेरा ही इंतेज़ार कर रहे थे। मुझे देखते ही खुश हो गये। मैने भी उनको चश्मा देने मे कोई देरी नही की।
उस रात मैं सो नहीं पाया, केवल उन बूढ़े दम्पति की बातें सिर मे घूमती रही। क्या चश्मा पुराना हो जाये तो उसे ऐसे फेंक देना चाहीये? मन के एक कोने से उत्तर आया, नहीं!
रचनाकार : अरुण कुमार सिंह

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