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वृंदावन के बंदर

लगभग 2:30 घंटे की ड्राइविंग कर के गाज़ियाबाद से वृंदावन पहुंचते ही सबसे बड़ी समस्या "पार्किंग" ढूढ़ने में सफलता मिली। बाँके बिहारी जी के मंदिर के पास ही पार्किंग की जगह मिल गयी । पार्किंग में कार खड़ी करके बाहर निकलने के लिए जैसे ही कार का दरवाजा खोला, वैसे ही तेज आवाज ने सावधान किया !! "भैयाजी जी आप लोग अपना और बेटे का चश्मा कार में ही रख दीजिए" क्यों भाई ? कौतुहल बस पूछ बैठा! ...
अभी यह सवाल पूछ ही रहा था तब तक मेरे बेटे के तरफ अचानक एक छोटा सा.. नटखट सा बंदर दौड़ा। मैने झट से बेटे को संभाला और बंदर वहां से चला गया। तब समझ मे आया कि बंदर बेटे का चश्मा झपटने आया था। फिर मैंने यह सबकुछ समझने में एक पल की भी देरी नही की और अपना और अपने बेटे का चश्मा झट से उतार कर कार में रख दिया। फिर हम लोग सावधानी बरतते हुए मंदिर के तरफ चलने लगे।
मेरे बेटे ने शिकायत के लहजे में रास्ते भर पूछता रहा " पापा!!बंदर मेरा चश्मा क्यों छीन रहा था??.." मेरे पास कोई जबाब नहीं था! फिर हम बाँके बिहारी जी के दर्शन करके वापस आने लगे। मेरे बेटे को शायद दर्शन भी ठीक से नही हो पाया होगा। क्योंकि उसका चश्मा नंबर वाला था जो कार में ही रख दिया था। ऊपर से लोगों की इतनी भीड़ !!! दर्शन के लिये चारो तरफ अफरा तफरी मची हुई थी। लेकिन बाँके बिहारी जी के भक्ति में ये सब कुछ पता नही चला। बस यह संतुष्टि थी की बेटे , माता जी, पत्नी और छोटे भाई को वृंदावन के दर्शन करा दिये। फिर मलाई वाली शुद्ध देशी लस्सी और मथुरा के पेड़े ने मन मे दो गुना मिठास घोल दिया।
अरे अरे.. रे रे... रुको रुको... चिल्लाने की आवाज सड़क पे आई और एक आदमी एक बंदर के पीछे भाग रहा था! तभी एक दुकानदार आदमी के तरफ एक फ्रूटी का पैकेट फेंका और आदेश के लहजे में बोला " बंदर के तरफ फ्रूटी फेंको!!" फिर उस आदमी ने जल्दी से फ्रूटी बंदर के तरफ फेंका!!! बंदर ने फ्रूटी झपट लिया और बदले में उधर से आदमी के तरफ चश्मा फेंका। कितने पैसे हुए फ्रूटी के? "उस आदमी ने अपना चश्मा साफ करते हुए दुकानदार से पूछा" उधर से जवाब मिला, "20 रुपये भाई साहेब!!" और साथ ही साथ अहसान भी जताया कि 20 रुपये में आपका 3000 रुपये का चश्मा मिल गया। उस आदमी ने 20 रुपये दुकानदार को दिये और चलता बना।
यह सब देख कर मेरे बेटे ने मुझसे सवाल पूछा " पापा ! ये सारे बंदर रहते कहाँ हैं और इनको खाना कहाँ से मिलता है? यहां तो सब घर बने हुए हैं और पेड़ अथवा जंगल तो कहीं भी बचे नहीं??? ... एक साथ कितने सवाल पूछ दिया!! और सवाल में ही उसके प्रश्नों का उत्तर भी मिल गया कि...
" पापा!! बंदर मेरा चश्मा क्यों छीन रहा था?..."
रचनाकार : अरुण कुमार सिंह

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